उन दिनों मैं गांव पर था। जाड़े को रात में दरवाजे पर अलाव के पास लोग बैठ जाते और बतकही चलती रहती, कभी राजनीति की, कभी बीबीसी पर चल रहे युद्ध के समाचार की, कभी गांव के छोटे मोटे झगड़ों की और कभी कुछ भूत प्रेत इत्यादि की भी। छोटी उम्र में राजनीति तो बिलकुल समझ नहीं आती थी पर राजनीतिक विषय पर जब दो लोग जोर जोर से आपस में वाकयुद्ध करने लगते तो मजा आ जाता, गर्माहट बढ़ जाती और रात का सन्नाटा कुछ कम हो जाता। सबसे ज्यादा शोर स्वर्गीय सागर बाबा के दरवाजे पर होता।
भूत प्रेत की कहानियां तब चलतीं जब राजनीतिक वाकयुद्ध में लगे लोग थक जाते। इन कहानियों के मास्टरमाइंड ज्यादातर सहोदर चाचा होते जो एक बार शुरू हो जाते तो बस कहते रहते, जैसे सब कुछ उसी तरह तरोताजा उनके पास पड़ा हो, हां, यह बात और थी कि इन भूत प्रेतों की तस्दीक नहीं हो सकती थी क्योंकि ये कहानियां हमसे पूर्व के समय की थीं। वैसे भी भूत प्रेतों की तस्दीक कौन कर सका है भला? अतः वे बिल्कुल निश्चिंत थे कि हम उनसे इन कहानियों के सबूत नहीं मांगने वाले थे। अतः बिना किसी भय के वे साधारण कहानियां भी रोचक बना देते और हम सब उनकी कहानियों में डूब जाते। हां, रात को यदा कदा उनके भूत हमारे सपनों में उतर जाते तो हमारी हालत पतली हो जाती, इसमें कोई सदेह नहीं था।
उस दिन शायद शनिवार था जब उन्होंने हमें दक्खिन टोला के जिन्न की कहानी सुनाई। यह जिन्न नाराज होने पर आसमान से जलती हुई लकड़ियों की बारिश करता था। यह सुनकर हमारी जिज्ञासा सौ गुना बढ़ गई थी। कहानी गांव के दक्षिणी टोले में बसे मातबर पांडे के परिवार और उस घर में रहने वाले जिन्न की थी जो मातबर पांडे के साथ कहीं से उनके घर चला आया था। उसने वहीं डेरा जमा लिया था और अब जाने का नाम ही नहीं लेता था। पूरा परिवार उसके कृत्यों से परेशान हो चला था। तवे पर पक रही रोटियां अचानक गायब हो जाती जो सवेरे पास के इमली के पेड़ के नीचे मिलती। बक्से में रखे कपड़े बिना आग के ही राख में तब्दील हो जाते। उनकी पत्नी के द्वारा पोस्ट आफिस बाक्स में डाले गए पत्र अगले दिन उसी घर में मिलते जैसे भेजे ही नहीं गए हों और कई बार तो जब मातबर पांडे के बेटे कहीं साइकिल से जाने को तैयार होते तो साइकिल के दोनों टायर बिना हवा के मिलते। उनके वाल्व भी अक्सर गायब होते। यह सब सुनकर हम बच्चों के रोंगटे खड़े हो जाते और बिना पूरी कहानी सुने बिना ही हम लोग अपने मां पिता के पास बिस्तर में दुबक जाते। डर होता कि कहीं जिन्न यह जान गया हो कि हम उसकी कहानी सुन रहे हैं और वह हम पर कोई नया टोटका न कर दे।
खैर एक दो दिन बाद सहोदर चाचा फिर शुरू होते और जिन्न फिर हमारे स्वप्नों के घूमने लगता। आगे उन्होंने बताया कि पांडे जी बनारस में किसी वैद्य जी के यहां मुलाजिम थे। उस जिन्न के मातबर पांडे के घर आने और उनसे नाराजगी का कारण भी बड़ा दिलचस्प था। उस समय बनारस से भटनी स्टेशन छोटी लाइन की ट्रेन चलती थी जो बीच बीच में चेन पुलिंग होने पर आधे आधे घंटे तक रुक जाती। गार्ड आकर वैक्यूम पाइप ठीक करता । रात का समय था और वह लघुशंका हेतु ट्रेन से यह सोच उतरे की बाहर लघुशंका भी कर लूंगा और थोड़ी खुली हवा भी मिल जायेगी। पर संयोग कुछ अच्छा नहीं था क्योंकि उनके यात्रा पर निकलते ही बिल्ली ने रास्ता काटा था। वह बाहर निकले और कुछ आगे धुंधलके में बैठ कर मूत्र विसर्जन करने लगे। ऐसा करते ही जैसे एक ठंडी हवा का झोंका उनसे टकराया और उनके रोम में एक कंपकपी सी दौड़ गई। वह कुछ भी समझ न सके। तब तक लाइन क्लीयर हो चुका था और वह घबराकर अपनी सीट पर जा बैठे। भटनी उतरने पर उनके सिर में तेज दर्द सा महसूस हुआ। उन्होंने कुछ दवाइयां लीं और धीरे धीरे इक्का स्टैंड की ओर बढ़ने लगे क्योंकि उन दिनों में भटनी से गांव तक इक्का ही चलता था। इक्के का घोड़ा उन्हें पास आता देख जोर-जोर से हिनहिनाने लगा। जैसे तैसे वह गांव पंहुचे पर तबियत ठीक न लगने के कारण दो दिन बाद ही वापस बनारस चले आए।
उनके बनारस जाते ही उनके घर में नए नए तमाशे शुरू हो गए। कुछ दिनों तक माजरा कोई नहीं समझ पाया पर धीरे धीरे लोगों को शंका होने लगी और कि उनके घर पर किसी भूत प्रेत का साया अवश्य है। ओझा गुनिया बुलाने की बात होने लगी। कुछ लोग हनुमान चालीसा पढ़ने का सुझाव देते। उनकी पत्नी और भाई ने काफी जतन एवं पूजा पाठ किए पर कोई फायदा नहीं हुआ अतः मजबूर होकर वे गांव से सात कोस दूर एक तांत्रिक से मिलने गए जो भूत भगाने का कार्य करता था। उसके पास कोई तेलिया मशान भी था जो उसकी तांत्रिक शक्तियों को जागृत किए रहता।
“ये तेलिया मशान क्या है चाचा?” हम में से किसी ने जिज्ञासा जाहिर की।
“यह तेली जाति के व्यक्ति के गर्दन की हड्डी होती है जिसे तांत्रिक आधी रात महानिशा में शमशान जाकर जागृत करता है”। यह सुनकर हमारी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई और दुबारा कोई और प्रश्न पूछने की किसी में हिम्मत नहीं थी।
खैर, अगले शनिवार का दिन तय हुआ। मातबर पांडे के भाई के तांत्रिक के यहां से लौटने के तत्काल बाद जिन्न का प्रकोप और बढ़ गया । रात में इमली के पेड़ पर से तरह तरह की आवाजें आती रहती, कभी ढिबरी अपने आप जलने लगती तो कभी कोई मांस जलने जैसी गंध फैल जाती। घर वाले चैन से सो न पाते । जैसे तैसे तीन दिन बीते और शनिवार आ गया। तांत्रिक गांव के सिवान में प्रवेश करते ही कुछ मंत्र जपने लगा था। मातबर पांडे के भाई उसे अभी अपने दरवाजे पर लाए ही थे कि यह क्या, आसमान से जलती हुई लकड़ियां गिरने लगीं। यह देख तांत्रिक के हाथ पांव फूल गए और वह भागने की तैयारी करने लगा। जाते जाते उसने परिवार से घर में जिन्न होने की बात बताई जिसका इलाज उसके पास नहीं था। उसका तेलिया मशान यहां पूरी तरह बेकार हो चुका था और वह वहां से ऐसे भागा जैसे उसकी जान पर बन आई हो। उसकी धोती पीछे से खुल चुकी थी और गांव वाले उसे देखकर हंसे जा रहे थे।
अंततः बात वहीं की वहीं रह गई । मातबर पांडे की पत्नी ने यह सब कुछ एक पत्र में लिख कर बनारस भेजा पर अगले दिन वह चिट्ठी घर पर मिली। हैरान परेशान हो कर उनके भाई बनारस जा पंहुचे और सारी बात मातबर पांडे को बताई। वह हैरान हो उनकी बातें सुन रहे थे जैसे उन्हें उनकी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उन्हें इन बातों की जरा भी खबर नहीं थी। अगले दिन उन्होंने वैद्य जी को सारी बात बताई जिसे सुन कर वह भी चौंक पड़े। पर उन्होंने पांडे जी को ढांढस बंधाया और उन्हें मणिकर्णिका घाट के पास तांत्रिक भैरवनाथ से मिलने को कहा। अगले दिन डरते डरते उन्होंने तांत्रिक भैरवनाथ के आश्रम से संपर्क किया और अनुमति मिलने पर अंदर प्रवेश किया। भैरवनाथ अपने आश्रम के एक कमरे में ध्यान मग्न थे। दंडवत करने के दौरान आहट सुन उन्होंने आंखें खोली। वह दोनो भाइयों के चेहरों की ओर शांत हो देख रहे थे। पूछा, “क्या बात है?” पूरी बात सुनकर पुनः ध्यानमग्न हो गए। थोड़ी देर बाद कहा, “समाधान हो जाएगा पर तुम्हें अपने घर से अक्षत लाना होगा , उसके बाद अपने गांव जाकर पीले वस्त्र पहन कर उस जिन्न की पूजा करनी होगी”। मातबर पांडे चौंक पड़े, “जिन्न की पूजा?” डरते डरते उन्होंने उनसे पूछा, “जिन्न के मेरे घर में प्रवेश का कारण क्या है बाबा?”
“यह तो अक्षत लाने के बाद ही पता चलेगा”, बाबा ने कहा।
मातबर पांडे के भाई अगली ही ट्रेन से गांव चले गए और दो दिन बाद अक्षत ले कर फिर बाबा के आश्रम में पंहुचे। भैरव बाबा ने अक्षत अपने हाथों में लेकर जैसे सब समझ लिया। बोले, “कभी रात को जखनिया स्टेशन के आस पास रेलगाड़ी से उतर कर मूत्रत्याग किया था ?”
मातबर पांडे को कुछ भी याद नहीं था पर स्मृति पर बहुत जोर डालने पर वह अजीब सा गरम हवा का झोंका और उनका असहज महसूस होना, सब याद आ गया। उन्होंने भैरव बाबा को सब बता दिया। बाबा ने कहा, “अब चिंता मत करो, वह नाराज तो है, पर वह तुम्हारा अहित नहीं करेगा, आशा है वह तुम्हारी पूजा के बाद तुम्हारा घर छोड़ दे, पर याद रहे की पूजा के समय तुम्हारे परिवार का कोई सदस्य पास में नहीं होना चाहिए, और उसके बाद भी अगर नहीं जाता तो दूसरे उपाय भी हैं “। उन्होंने जिन्न की पूजा के हेतु एक मंत्र भी कागज पर लिख कर दिया। मातबर पांडे बहुत घबरा गए थे। अगले दिन उन्होंने भैरव बाबा के बताए अनुसार पूजन सामग्री खरीदी, जिन्न को अर्पित करने के लिए एक चादर और अपने लिए पीले वस्त्र भी। यह सब लेकर वह गांव चले आए।
अगली रात्रि को बारह बजे उन्होंने दीपक जला कर यथा विधि पूर्वक पूजा शुरू की। रात का सन्नाटा उन्हें भयभीत कर रहा था। कुत्ते जोर जोर से भौंक रहे थे और कभी कभी समवेत स्वर में रोने लगते। वह एक हाथ में जल अक्षत लेकर मंत्र बुदबुदा रहे थे तो दूसरे हाथ में माला से जाप की संख्या गिनते जाते, आंखें डर के मारे बंद थीं। एक सौ आठ बार जपने के बाद उन्होंने बाबा के बताए अनुसार अपने दोनो हाथों से जिन्न की चादर ऊपर की ओर उठा दिया। तभी दीपक किसी तेज हवा के झोंके के कारण बुझ गया। इमली का वृक्ष अचानक जोर जोर से हिलने लगा। मातबर पांडे डर के मारे कांप उठे पर थोड़ी देर बाद सब शांत हो गया। उन्होंने अनुभव किया कि जो चादर उन्होंने ऊपर उठाई थी वह उनके हाथों में नहीं है। वह आंखें खोल अपने हाथों को देखना चाहते थे पर आंख खोलने की हिम्मत उनमें कहां थी। वह जानते थे कि दीपक बुझ चुका है, चारों ओर धुप्प अंधेरा होगा और सामने न जाने क्या दृश्य हो, कहीं जिन्न सशरीर सामने बैठा हो, यह कोई नहीं जानता। काफी देर बीतने के बाद उन्होंने आंखों के कोनों से सामने देखा तो वहां अंधेरे के सिवा कोई नहीं था। इमली का पेड़ अब पूरी तरह शांत था और आसपास उनके द्वारा जलाई गई अगरबत्ती की खुशबू फैल रही थी।
अंततः मातबर पांडे का परिवार अब अभिशाप मुक्त हो चुका था। इधर सहोदर चाचा कहानी सुनाकर मौन हो चुके थे पर हम सब मारे डर के जैसे कांप रहे थे। अगली सुबह मिलने पर हम सभी ने कसम खाई कि हम अब कभी भी किसी अनजान जगह पर मूत्रत्याग नहीं करेंगे। कहीं ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ तो?