लोग आते रहेंगे, लोग जाते रहेंगेहम कहानी खुद अपनी बनाते रहेंगेबहारों का मौसम या पतझड़ कोईहम तुझपर दिलो-जां लुटाते रहेंगे। तुम जो चलकर थकोगे कभी राह परकांधे थपकी हम आकर लगाते रहेंगेइंद्रधनुषों में जैसे खिले सात रंगतुझको सपनों में आकर जगाते रहेंगे। हमने यहां कुछ लकीरों को खींचालकीरों से कितनों को रस्ता मिलाकभी रश्मियों से कभी जगनुओं सेहम तेरी राह रौशन बनाते रहेंगे। हमने गमों के सभी रंग देखेबहुत से...
कोहरा
मानता हूं कि अब कोहरा घना हैमगर चुप बैठने से क्या बना है? घर से निकल कुछ कर के देखोअंगीठी सेकने से क्या बना है? महज संघर्ष ही है राह वत्सलचुपचाप बैठे सोचने से क्या बना है? लड़ेंगे जूझेंगे कठिनाइयों सेसिर्फ अंगड़ाईयों से क्या बना है? जो कहते हैं कमजोर तुमकोउनके कहने भर से क्या बना है? बेमन हो के तुम कुछ भी न करनाकर्म को त्यागने से क्या बना है? अमावस भी तो अक्सर जगनुओं से हारती हैनियति से हार को...
जो न मिला सोचकर के क्या होगा?
जो न मिला सोचकर के क्या होगा?एक नए गम का सिलसिला होगा। मंजिलें और भी तो हैं मुमकिनआदमी और भी रवां होगा। फूल गर गिर गए हैं शाखों सेपुष्परज वहीं पर गिरा होगा। चमन में फ़स्ल-ए-गुल के आते हीनई कलियों का सिलसिला होगा। लकीरें खींच ले नई खुद हीलकीरें खोजने से क्या होगा? रंज का वक्त कबका बीत गयाजख्म की सोचने से क्या होगा? अंधेरे जगनुओं से हार गएरौशनी खोजने से क्या होगा? राह पर आगे को कदम तो बढ़ासिर्फ बस...
कभी तो जिंदगी में…
कभी तो जिंदगी में पीछे मुड़कर देखना होगाकभी ये सोचना होगा कि कहां से चलके आए थे? वे राहें कौन सी थीं जो हमारे घर को जाती थीवे बातें कौन सी हैं जो अभी तक याद आतीं हैं। वो कैसे लोग थे जिसने हमें चलना सिखाया थावो कैसी माएं थीं जिनने हमें लोरी सुनाई थी। उन हल्की थपकियां ने कैसे चुपके नींद दे डालीकि कैसे आंचलों में यूं लगा संसार सारा है? कमी तो थी वहां पर साथ रिश्तों की अमीरी थीमहज दो पुपलियो में...
स्वप्न
तुम कोई भी स्वप्न देख लोपर कर्म तो करना पड़ेगाकिसी भी दीप की तरहहर रात को जलना पड़ेगा। ये यूं नहीं कि कोई भीआ कर मिसाल बन गयाये यूं नहीं कि कोई भीआ शिखर पर चढ़ गया। ये यूं है कि दीपक में भीएक बाती है सदा जलीये यूं है कि इस राह परश्रम से ही मंजिल मिली। कितने ही लोग कर्मरतबस स्वेद में पिघल गएकितने ही अपने कर्म सेयह जिंदगी बदल गए। बहुत घना तिमिर था वोपर जुगनू जब चमक उठेवो रात मुझ्को याद हैजब अंधकार...
श्रमिक
हर समय बहार का मौसम नहीं होताहर दिवस भी प्यार का मौसम नहीं होता। कभी तो गर्मियां भी खूब लोगों को सताती हैंकभी तो बारिशें भी आसमां से रूठ जाती हैं। कभी जाड़ों की कंपाती ठंढ सबको बेध जाती हैया पतझड़ का महीना खींचता अपनी पनाहों को। कभी यूं लग रहा होता कि रातें बहुत लंबी हैंकभी तो ये भी लगता अब सहर फिर से नहीं होगी। थका सा आदमी ये मानकर खामोश रहता हैकि मौसम भी कहीं पर हर समय एक सा नहीं रहता। खिले हैं...
गंगा तुम अविरल ही बहना
गंगा तुम अविरल ही रहनातीर्थो के सारे घाटों परकलकल बहती रहनातुम ही तो हो मोक्षदायिनीतुम ही तो हो पतित पावनीतुम ही तो हो भरत भूमि कीसब नदियों का गहनागंगा तुम अविरल ही रहना। तुम भारत की जीवनरेखातुम काशी का भूषणतुम प्रयाग की कुंभवाहिनीकरती सबका पोषणबीती सदियों में क्या क्या बीतासबकी हो तुम साक्षीक्या क्या घटा कभी घाटों परदेखी हर परिपाटीकिसके किसके पाप धुले हैंकिसके रह गए बाकीसच अब तुम ही कहनागंगा तुम...
अपना अपना मोक्ष
प्रोफेसर शिवकुमार अपने विभाग में अपने अगले व्याख्यान की तैयारी कर रहे थे। कुछ परेशान भी लग रहे थे तभी विभागाध्यक्ष ने कक्ष में प्रवेश किया। “नमस्कार बंधु, कैसे हैं? सब कुशल तो है न? उन्होंने पूछा।न जाने कैसे उन्होंने प्रोफेसर शिवकुमार के चेहरे पर अंकित परेशानी की रेखाएं पढ़ ली थीं। “नमस्कार, सब ठीक है सर, आप कैसे हैं?” प्रोफेसर शिवकुमार ने पूछा। “मैं भी ठीक हूं, क्लास कब है?” “बस, इसके बाद।” “अरे...
सुधर जाइए
अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।
देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।
आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।
नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।
यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।
जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।
तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।
लाखों सपने ढेरों गम
लाखों सपने ढेरों गमखुशियों के पल बहुत ही कमआस टूटती हो राहों परफिर भी न करना आँखें नम।लाखों सपने ढेरों गम…कभी न करना आँखें नम। तूफानों का शोर बोलताहम देखेंगे किसमें है दम?कौन चढ़ेगा शौर्य शिखर परकौन गिरेगा हो बेदम?लाखों सपने ढेरों गम…कभी न करना आँखें नम। छाए हों बादल, रात अंधेरीपांव में छाले, टूटता दममांग न लेना कोई सहाराजिससे होगी कीमत कम।लाखों सपने ढेरों गम…कभी न करना आँखें नम। जीवन की इस...