सितंबर का महीना दो दिन पहले शुरू हुआ था। कुलपति महोदय के आदेशानुसार महाविद्यालय सभागार में छात्र छात्राओं को नई शिक्षा नीति से परिचित कराया जा रहा था। प्राचार्य मकरंद त्रिपाठी एवं प्रोफेसर नवनीत सिंह कुछ फाइलें लेकर मंच पर आसीन थे। वह आपस में नई शिक्षा नीति के अंग्रेजी संस्करण को सामने रखकर कुछ चर्चा कर रहे थे। अंग्रेजी संस्करण के कारण उन्हें उसे ठीक से समझने में बड़ी दिक्कत हो रही थी परंतु उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था। शिक्षा नीति को महाविद्यालय में आज से प्रारंभ करना था अन्यथा और विलंब हो जाता क्योंकि जुलाई और अगस्त का महीना तो पुराने पाठ्यक्रम को ही पढ़ाने में बीत गया था। अनुचर आसन व्यवस्था में लगे थे, कुछ अन्य शिक्षक भी आकर बैठ चुके थे। अंततः प्राचार्य की अनुमति से उन्होंने छात्र छात्राओं को संबोधित करना शुरू किया।
“प्रिय छात्र-छात्राओं, आज से नई शिक्षा नीति के पाठ्यक्रमों की शुरुआत होने वाली है जिसमें आप सभी को बहुत सारे पाठ्यक्रमों के विकल्प मिलेंगे। अब आपको अपने पाठ्यक्रम चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता मिलेगी साथ ही जब कभी आप चाहे बीच में पढ़ाई छोड़कर स्टार्टअप शुरू कर सकते हैं और फिर अगर भविष्य में कभी मन हुआ तो फिर आप महाविद्यालय आकर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं।”
“स्टार्टअप” शब्द सुनते ही छात्र-छात्राओं के मन में गुदगुदी होने लगी क्योंकि उन्होंने कई नेताओं से और टीवी पर यह शब्द कई बार सुना था। कुछ छात्राओं को उनकी चर्चा में “स्वतंत्रता” शब्द भी बड़ा रोचक लग रहा था और उनके मन में सहसा एक पुराना फिल्मी गीत गूंजना शुरू हो गया:
“पंछी बनू उड़ती चलूं मस्त गगन में, आज मैं आजाद हूं दुनिया के चमन में” ।
अब वह और एकाग्रता से डॉ नवनीत की बातें सुन रही थीं और उनके मन में उम्मीद और जिज्ञासा का संचार होने लगा। छात्र-छात्राओं के बीच प्रसन्नता एवं कौतूहल देखकर डॉ सिंह ने अपनी बात अब एक उदाहरण के माध्यम से शुरू की क्योंकि उनका साहित्यकार मन जाग उठा, उन्हें भी लगने लगा कि नई शिक्षा नीति में कुछ न कुछ जादू तो अवश्य है।
उन्होंने कहा, “मान लो कि तुम सभी पक्षी की भांति हो और इस महाविद्यालय की किसी डाल पर बैठे हो, अचानक तुम्हारा मन करता है कि तुम आसमान में उड़ने लगो, कोई स्टार्टअप कंपनी खोल लो, लोगों को रोजगार दो, तो तुम पाठ्यक्रम बीच में छोड़कर कहीं और चले जा सकते हो, किसी और प्रदेश में या विदेश में, अब आपको कोई टेंशन लेने की जरूरत नहीं है, महाविद्यालय में आप का रिकॉर्ड रहेगा, चार, पांच या दस साल पर आप जब भी आना चाहते हैं, आप आकर अपना कोर्स पूरा कर सकते हैं।”
उन्होंने कंप्यूटर बाबू की ओर इशारा करते हुए कहा, “यह आपका सारा रिकॉर्ड रखेंगे, और आप जब भी आना चाहेंगे महाविद्यालय की ओर से वेलकम है। यह अपने आप में एक नया आयाम है जो पहले की शिक्षा नीतियों में नहीं था और इसके लिए हम सबको इस सरकार का धन्यवाद करना चाहिए।”
प्राचार्य मकरंद त्रिपाठी अभी भी नई शिक्षा नीति के प्रारूप में भारतीय संस्कृति, गुरुकुल की शिक्षा पद्धति, बटुकों द्वारा समिधा जुटाना, ब्रह्मज्ञान, शास्त्रार्थ और विश्वगुरु बनाने के उपादान ढूंढ रहे थे पर उन्हें उसमें यह शब्द ही नहीं मिल रहे थे। उन्हें अचंभा हो रहा था कि अपनी सांस्कृतिक परंपरा एवं मान्यताओं की बात करने वाली सरकार ने इस शिक्षा नीति में कैसे-कैसे शब्द प्रयोग किए थे जो उनकी समझ से ऊपर जा रहे थे जैसे, “आड एंड इवन सेमेस्टर”, “पैराडाइम शिफ्ट इन एजुकेशन”, “कैंपसेज आफ फॉरेन यूनिवर्सिटीज”, “डिजिटल लाइब्रेरी”, “ऑनलाइन एजुकेशन, “इनोवेटिव करिकुला” इत्यादि इत्यादि। यह किस तरह गुरुकुल से संबंधित हैं, उनके इस प्रश्न का उत्तर कहीं नहीं था। ना ही किसी वटवृक्ष या पीपल के वृक्ष का कोई वर्णन था जहां गुरुकुल में बच्चे ज्ञान प्राप्त किया करते थे। तभी उन्होंने सुना कि अब उन्हें बोलने के लिए बुलाया जा रहा है। उन्होंने माइक संभाला और अपने सामने नई शिक्षा नीति का प्रारूप रखकर उसमें लिखे बड़े शब्द एक के बाद एक छात्रों के सामने दोहरा दिए, उनके जोशीले भाषण को सुनकर तालियां जोर-शोर से गूंजने लगी। उन्होंने कुछ नए पाठ्यक्रम भी छात्रों को सुनाए जैसे, कम्युनिकेशन स्किल्स एंड पर्सनैलिटी डेवलपमेंट, स्पोकन इंग्लिश, डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन, पापुलर लिटरेचर, फूड प्रोसेसिंग, इत्यादि इत्यादि जिनको सुनकर छात्रों के चेहरे पर जिज्ञासा और प्रसन्नता का भाव और बढ़ने लगा परंतु अगले पन्नों पर इनके शिक्षक किस तरह नियुक्त होंगे, कौन पढ़ाएगा, कहां से आएंगे, कहीं कुछ भी वर्णित नहीं था।
अगले कुछ महीने बड़े ही अस्त व्यस्त रहे, छात्रों का नए पाठ्यक्रमों में प्रवेश हो रहा था, नई शिक्षा नीति अपने पूरे शबाब पर थी, इधर के पाठ्यक्रम उधर मिल जा रहे थे, इधर के कोड उधर फीड हो जा रहे थे, कंप्यूटर बाबू परेशान थे, प्राचार्य मकरंद त्रिपाठी और प्रोफेसर नवनीत अपने सिर पर बाम मले जा रहे थे। नए पाठ्यक्रम जैसे तैसे शुरू हो गए, नए शिक्षकों का कोई अता-पता नहीं था, छात्र-छात्राएं उनकी तलाश में हताश होकर थक चुके थे। तभी सेमेस्टर परीक्षाएं शुरू हो गई और इन सारे प्रश्नों पर विराम लग गया। विभाग अब छात्रों के द्वारा गूगल से उतारे गए असाइनमेंट से भर गए थे और शिक्षक बारी बारी से उनके मूल्यांकन में तल्लीन। दो सेमेस्टर और बीतते ही प्राचार्य मकरंद त्रिपाठी और प्रोफेसर नवनीत ने यह महसूस किया कि अब छात्र रूपी पंछी महाविद्यालय की डाल पर कम होने लगे हैं। उन्होंने ध्यान से वहां लगे वृक्षों को देखना शुरु कर दिया, न जाने क्यों उन डालियों पर फल नहीं थे, यही नहीं, उन पर कोई वसंत भी नहीं आया था। वर्ष भर चलने वाली परीक्षाओं के मौसम ने शायद उन डालियों को भ्रम में डाल दिया था कि अभी फलों के आने का समय नहीं आया है। यही नहीं, जो शिक्षक अपनी कक्षाएं छात्रों से भरी हुई देखकर पूरे मन से पढ़ाने की जुगत में रहते उनके चेहरों पर एक उदासी ने अपना घर बना लिया था। भाषा साहित्य के शिक्षकों की हालत तो और भी बुरी थी, तुलसी और कालिदास पर वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जा रहे थे, उनकी पंक्तियों के सार और महत्व के स्थान पर वे कहां जन्मे और उनकी पत्नी का नाम क्या था महत्वपूर्ण हो चला था, यहां तक कि किंबदंतियों में कालिदास जिस वृक्ष की डाल को काट रहे थे उस पेड़ का भी नाम पूछा जाने लगा था। प्राचार्य मकरंद त्रिपाठी एवं डॉ नवनीत सिंह यह जान गए कि नई शिक्षा नीति के द्वारा बहेलिये ने बड़ी चालाकी से अपना जाल बिछाया था क्योंकि वह सभी पक्षियों को एक स्वप्न दिखाकर कहीं और ले जाना चाहता था। उसकी सफलता के सबूत महाविद्यालय में मिलने शुरू हो चुके थे क्योंकि इक्का-दुक्का पंछी ही महाविद्यालय में किसी वृक्ष की डाल पर बैठे हुए दिखाई दे रहे थे।
महाविद्यालय की रौनक खत्म हो चली थी, चारों ओर एक मुर्दनी सी छाई थी। जिस पुस्तकालय में किताबों के लिए छात्र पंक्ति बनाकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते थे अब वहां कोई नहीं था। कक्षाओं में भी कहीं दो तो कहीं तीन और ज्यादा से ज्यादा पांच छात्र बैठे हुए मिल रहे थे। नई शिक्षा नीति और डिजिटल क्रांति का उत्कर्ष काल बहुत जल्दी आ चुका था। सभी शिक्षक इस बदलाव से आहत थे परंतु अब उनके हाथ में कुछ नहीं था। प्राचार्य कर भी क्या सकते थे। कहीं से कोई मदद भी नहीं मिल रही थी कि वह शिक्षकों का इंतजाम करते, कभी-कभी उनका मन उचट जाता, इच्छा होती कि वह छात्र रूपी पक्षियों से कह दें कि “चल उड़ जा रे पंछी कि अब यह देश हुआ बेगाना” पर कहें कैसे, उनके मुख से यह शब्द नहीं निकलते, आखिरकार वह भी एक शिक्षक ही थे। अब धीरे-धीरे उन्होंने भी मानना शुरू कर दिया था कि मेरे अन्य छात्र किसी स्टार्टअप के लिए गए हैं, कभी न कभी तो आएंगे। यह स्वप्न कम से कम उन्हें और वहां के शिक्षकों को एक दिलासा तो दे ही रहा था। प्रोफेसर नवनीत एक अच्छे शिक्षक थे, उन्होंने गीत में अपने लिए भी एक संदेश पढ़ लिया था:
खत्म हुए दिन उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था।
शिक्षकों की नई शिक्षा नीति के प्रति निराशा को बखूबी उतारा है Sir आपने।