चाणक्य अपने कक्ष में विश्राम कर रहे थे तभी अनुचर ने उन्हें उनके शिष्य चंद्रगुप्त के आने की सूचना दी। स्वर्ग में उन्हें रहते सदियां बीत चुकी थीं । चंद्रगुप्त पास के प्रांगण में रहते थे, पूर्व में जब कभी उनका गुरु से मिलने का मन होता तो सूचना आ जाती, आखिरकार वह पाटलिपुत्र के पूर्व सम्राट थे । मिलने पर वे दर्शन, साहित्य और राजनीति की चर्चा करते, कुछ पुस्तकों की भी चर्चा करते। धरती से कभी-कभार ही कोई सूचना आती कि उनके वंशज कैसे राजकाज चला रहे हैं। उनके लिए स्वर्ग एक वानप्रस्थ की तरह था जिसका दोनों ने भरपूर आनंद उठाया था, परंतु कल रात्रि से ही चंद्रगुप्त के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, वह सो नहीं पाए थे और उन्हें बार-बार धरती पर अपने वंशजों का की याद आ रही थी, उन्हें लग रहा था कि उनके राज्य पर कोई न कोई संकट तो अवश्य आया है। बात थी भी चिंताजनक क्योंकि पिछले दो साल से कोई भी पाटलिपुत्र से स्वर्ग आकर उनसे मिलने नहीं आया था। चंद्रगुप्त को अचानक आते देखकर चाणक्य भी आश्चर्यचकित थे। उन्हें कोई ऐसा कारण नजर नहीं आ रहा था लेकिन फिर भी कोई गुरु अपने शिष्य को आते हुए देखकर प्रसन्न कैसे नहीं होता। उन्होंने चंद्रगुप्त को बैठने को कहा और फिर उनसे उनके आने का कारण पूछा?
“क्या बात है वत्स, आज सुबह-सुबह?”
“गुरुदेव, आज मेरा मन बहुत अशांत है, पता नहीं क्यों मुझे धरती पर अपने वंशजों की चिंता होने लगी है?”
“कोई आया है क्या वहां से?” चाणक्य ने पूछा।
“यही तो चिंताजनक है कि पिछले दो साल से कोई मिलने नहीं आया।”
“अच्छा, ऐसा है क्या?” चाणक्य स्वयं ही चिंतित होते दिखे?
उन्होंने चंद्रगुप्त से पूछा, “तो क्या सोच रहे हो?”
“क्यों ना हम दोनों एक बार चल कर देख आएं?”
“असंभव, यह कैसे होगा?”
“हमें इंद्र देवता से अनुमति लेनी होगी।”
तीन दिनों के बाद दोनों स्वर्ग के गगनयान से पाटलिपुत्र की ओर प्रस्थान कर गए। उन्हें सूचना थी कि पाटलिपुत्र में इस समय उनके ही वंश के सम्राट नीतिगुप्त का शासन चल रहा है। वहां का मंत्री तेजवीर है, ऐसा किसी ने बताया था। पाटलिपुत्र पहुंचने पर उन्होंने गगनयान से उतरते ही रिसेप्शन पर सूचना दी की महाराज चंद्रगुप्त और चाणक्य पधारे हैं, शीघ्र ही रथ का इंतजाम किया जाए और नीतिगुप्त को उनके आने की सूचना दी जाए। सभी कर्मचारी इन दोनों नामों से पूर्णतया अपरिचित थे। उन्होंने उन्हें पुलिस बूथ की ओर भेज दिया। पुलिस बूथ पर पूछताछ करने पर पुलिस वालों को उन पर संदेह होने लगा और उन्होंने उन दोनों को बैठा लिया । उनकी वेशभूषा अलग लग ही रही थी, एक राजा की वेशभूषा में और दूसरा योगी के वेश में, यह मेल तो कहीं दिखाई नहीं देता।
चाणक्य मन ही मन क्रोधित हुए जा रहे थे, उन्हें वहां उनको बैठाया जाना बहुत बड़ा अपमानजनक लग रहा था, वह बार-बार चंद्रगुप्त को घूरते जैसे अपने शिष्य की बुद्धिमत्ता पर संदेह कर रहे हों क्योंकि वह वहां चंद्रगुप्त के कारण ही आए थे। चंद्रगुप्त पुलिस वालों को समझाने की कोशिश कर रहे थे कि वह वहां के राजा के पूर्व वंशज है पर पुलिस वालों को उनके बारे में कुछ पता ही नहीं था। वे उनकी वेशभूषा पर लगातार हंसे जा रही थी जैसे वह सम्राट होने का ढोंग कर रहे हों ।
तभी थानाध्यक्ष चंदगी राम ने उन्हें डांटा, “अरे क्या नौटंकी है जी? कहते हैं, राजा साहब के संबंधी है, आ लग रहे हैं नाच बाजा वाले? पहले कौन जात हो जी, जात का नंबर बताओ? फारवर्ड हो कि बैकवर्ड?”
चंद्रगुप्त और चाणक्य दोनों हतप्रभ रह गए? इतनी सदियों में पाटलिपुत्र को क्या हो गया था उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था? परिचय पूछने का यह कैसा तरीका है?
थानेदार ने चाणक्य से पूछा, “आ तुम कौन बाम्हन हो जी, दरभंगिया हो कि छपरहिया हो, बात को ऐसे करते हो जैसे बड़का शंकराचार्य के नाती हो, तुम लोगों को अब हम अच्छे से पहचानते हैं, बहुत हल्ला करते हो…चौप्प,।”
ज्यादा बोलोगे तो ऐसा ऐसा धारा लगाएंगे न कि जिंदगी भर जेल में रहोगे।”
चाणक्य को लगा कि काटो तो खून नहीं, उनका ऐसा अपमान पाटलिपुत्र में असंभव था। शायद समय उनके विपरीत हो चला था। अब यहां उनके ज्ञान और व्यक्तित्व का कोई महत्व नहीं था, ना कोई स्मरण ही था, शायद उनकी पुस्तक अर्थशास्त्र भी किसी ने नहीं पढ़ी थी। उधर चंद्रगुप्त गुरु का यह अपमान देखकर गुस्से से लाल हुए जा रहे थे, उनका मन हो रहा था कि अगर अभी उनके हाथ में तलवार होती तो वह थानेदार की गर्दन काट लेते। चंद्रगुप्त थानेदार की ओर लपके परंतु चाणक्य ने उन्हें रोक दिया। उन्हें अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र मे वर्णित नीतिसूत्र अभी भी याद था जिसमें उन्होंने ज्ञान और सत्य के महत्व पर टिप्पणी लिखी थी। उनके अनुसार राज्य में ज्ञान और सत्य की स्थापना राजा के चरित्र पर आश्रित होती है, जैसा उसका चरित्र होता है वैसा ही वहां की प्रजा अनुसरण करती है, अगर उसका चरित्र ही इन चीजों से अछूता हो तो ज्ञान और सत्य का ह्रास निश्चित है । और जाति पूछना, जाति के नंबर, उन्हें तो यह और भी समझ में नहीं आ रहा था, और “फारवर्ड बैकवर्ड” किस भाषा का शब्द है, यह ना तो संस्कृत, पाली या मागधी ही है, इनका अर्थ क्या है? क्या पाटलिपुत्र में आदमी के व्यक्तित्व और कर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी जाति हो चली है?
चाणक्य ने कभी भी अपने शिष्य की जाति को कोई महत्व नहीं दिया था। चाणक्य के लिए चंद्रगुप्त सिर्फ उनका शिष्य था, उन्होंने उसे उसके राजा बन जाने के बाद भी सिर्फ अपना शिष्य माना था। चाणक्य के लिए जाति कोई विषय ही नहीं था जिस पर सोचा जाए क्योंकि किसी व्यक्ति का कर्म और विचार ही उसको महान बना सकते थे। यही नहीं, सम्राट बनने के लिए सबसे अपेक्षित योग्यता उसका चरित्र और व्यक्तित्व ही था। यहां तक कि सेल्यूकस की पुत्री हेलना से चंद्रगुप्त के विवाह में उन्होंने कभी कोई समस्या आती नहीं देखी थी। मगध के उच्च पद पर नियुक्तियों में चाणक्य ने हमेशा योग्यता को महत्व दिया था, शायद यही कारण था कि उनका साम्राज्य बर्मा से लेकर के सुदूरपश्चिम हिंदूकुश की पहाड़ियों तक फैला हुआ था। उन्होंने बिना समय गवाएं चंद्रगुप्त को आदेश दिया कि वह लोग पैदल ही सम्राट नीतिगुप्त के महल की ओर चलेंगे क्योंकि उन्हें पैदल चलने की आदत है, नंद वंश के शासन काल में उन्होंने कितनी बार तक्षशिला से पाटलिपुत्र की पैदल यात्रा की थी, और नीतिगुप्त तो अवश्य चाणक्य और चंद्रगुप्त को पहचान लेंगे, आखिर कुछ तो अपने पूर्वजों से उन्होंने उन दोनों के बारे में अवश्य सुना होगा। उधर सम्राट चंद्रगुप्त की इच्छा हो रही थी कि वह अपने युद्ध कौशल से इस पूरे थाने को तहस-नहस कर दें और फिर वापस स्वर्ग चले जाएं, परंतु अपने परिवार का मोह उन्हें वहां रुकने को विवश कर रहा था। वह समझ गए थे कि पाटलिपुत्र में शासन व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ चुकी है और उसे ठीक करने की जरूरत है ।अब उन्हें प्रामाणिक तौर पर लगने लगा कि वह बुरे स्वप्न पाटलिपुत्र के थे, उनकी मातृभूमि उन्हें पुकार रही थी क्योंकि उनके वंशजों ने ही उसकी ऐसी हालत कर दी थी।
पाटलिपुत्र के राजमार्ग का सारा परिदृश्य बदल चुका था, भाषा भी, और उन्हें हर तरफ किसी अन्य भाषा में लिखे हुए शब्द नजर आ रहे थे। पूर्व की संस्कृति भी पूरी तरह विस्थापित हो चुकी। मार्ग पर भीड़ ही भीड़ नजर आ रही थी और स्त्रियां बड़े ही कम वस्त्रों में विभिन्न वाहनों पर बैठी हुई दिखाई दे रही थीं। चाणक्य और चंद्रगुप्त उसी भीड़ में अपना अपना रास्ता ढूंढते हुए बढ़े चले जा रहे थे। पूछने पर पता चला कि सम्राट नीतिगुप्त का महल अभी एक कोस दूर है। दोपहर हो चली थी और सम्राट चंद्रगुप्त को भूख भी लग आई थी। तभी उन्हें एक जलपान गृह नजर आया और उन्होंने चाणक्य से जलपान कर लेने का आग्रह किया, दोपहर का समय हो चला था। चाणक्य को भी प्यास लग गई थी और उन्होंने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया। उन्होंने गौर किया कि सड़क के किनारे लोहे के खंभों के ऊपर दो लोगों के चित्र बड़ी सजावट के साथ लगे हुए थे। जिज्ञासा हुई कि सफेद कपड़ों में यह दोनों व्यक्ति कौन है? जलपान के दौरान चंद्रगुप्त ने अपने बगल की मेज पर भोजन कर रहे नागरिक से उन व्यक्तियों के बारे में पूछा जिनके चित्र वहां लगे थे। उसनें उनकी अज्ञानता पर मुस्कुराते हुए बताया, “यह सम्राट नीतिगुप्त है और उनके नीचे उनके उनसे थोड़ी छोटी तस्वीर में अमात्य तेजवीर है।” अपने वंशज सम्राट को सफेद कपड़ों में देखने पर चंद्रगुप्त सोच में पड़ गए कि आजकल के सम्राट क्या पहनने लगे हैं जिन वस्त्रों में थोड़ी भी विशालता नहीं है, ना सिर पर कोई मुकुट है, न उत्तरीय है, न ही कोई तलवार है।
भोजन के उपरांत दोनों आगे बढ़ चले। पास की किसी इंधन केंद्र पर बहुत भीड़ लगी थी, उन्होंने गौर से देखा तो पाया वहां एक बड़े फलक पर दो लोगों का चित्र था। दोनों चित्रों के नीचे जो भी लिखा था उस पर कालिख पोत दी गई थी, यह दोनों भी सम्राट नीतिगुप्त और तेजवीर की तरह मुस्कुरा रहे थे।
चंद्रगुप्त ने पास में ही चल रहे एक व्यक्ति से उनके बारे में पूछा, “यह लोग कौन है?”
“यह हस्तिनापुर के राजा विशेषगुप्त हैं और उनके नीचे जिसकी तस्वीर है वह उनके अमात्य चतुरसेन है।”
“उनकी तस्वीरों के नीचे लिखावट पर कालिख क्यों पोती गई है?” चंद्रगुप्त ने पूछा.
“आजकल युद्ध चल रहा है ना।”
“कैसा युद्ध?” उस व्यक्ति ने फिर से चंद्रगुप्त की ओर आश्चर्य से देखा जैसे उनकी अज्ञानता पर हंस रहा हो।
“अरे, चौबीस मैदानों वाला युद्ध, तुम नहीं जानते?”
चाणक्य की जिज्ञासा और बढ़ गई, उन्होंने और पूछा.
“फिर यह तस्वीर यहां क्यों लगी है, अगर युद्ध चल रहा है तो?”
“अरे भाई, यह इंधन हस्तिनापुर से ही तो आता है, इसीलिए शर्त के अनुसार उनकी तस्वीर लगानी पड़ती है।”
“पर पहले तो पाटलिपुत्र में ही हस्तिनापुर भी आता था, अब क्या हो गया?”
“सम्राट नीतिगुप्त और अमात्य तेजवीर की जातिवादी नीतियों के कारण हस्तिनापुर धर्मवादियों के हाथ में चला गया।”
“धर्मवादी? क्या नीतिगुप्त धर्मवादी नहीं है?” उन्होंने पूछा।
“हैं, पर उस रूप में नहीं है? वह तिलक नहीं लगाते, गेरुआ वस्त्र नहीं पहनते, और मंदिर नहीं बनवाते, ऐसे बहुत सारे फर्क इनमें और धर्मवादियों में है?” उसने उन्हें बताया।
चंद्रगुप्त को यह व्यक्ति बहुत समझदार लग रहा था।
अतः उन्होंने जाति का प्रश्न भी उससे पूछ लिया। “अच्छा यह बताओ, इस राज्य में जाति पर इतना जोर क्यों? यह जाति का नंबर कैसा?”
वह उन्हें घूरने लगा, “अरे भाई, अब हर जाति को एक नंबर दे दिया गया है जिससे उसका पता सरकार को पूर्व में ही लग जाए”, अब सम्राट नीतिगुप्त इस नंबर से ही अपने लोगों की संख्या के बारे में सब जान जाते हैं और अमात्य तेजवीर भी।”
“और हस्तिनापुर में क्या होता है?” सम्राट चंद्रगुप्त अब पूरी तरह पाटलिपुत्र की समस्या पास के राज्य से तुलना कर समझना चाहते थे।
“नहीं वहां जाति नहीं, दल से होता है। अगर आप सम्राट विशेषगुप्त के दल में हैं तो आपके सभी काम बहुत जल्दी हो जाएंगे और अगर आप किसी और दल में है तो आप सदा उपेक्षित रहेंगे, भले ही आप में योग्यता हो । सम्राट विशेषगुप्त और अमात्य चतुरसेन ने यह नीति बहुत सख्ती से लागू कर दी है और वह उस पर अमल भी कर रहे हैं।”
“तो यही उन दोनों में मूल अंतर है?”
“अंतर ज्यादा कुछ नहीं है, क्योंकि अब तो अमात्य चतुरसेन ने बहुत सारी नियुक्तियां जाति के आधार पर की हैं।”
चाणक्य सब सुन रहे थे, पर मौन थे, शायद किसी गहन चिंतन में लीन, उन्हें लग रहा था कि उनकी पुस्तक अर्थशास्त्र अभी भी अधूरी है क्योंकि उस पुस्तक में उन्होंने राष्ट्रधर्म के अलावा किसी अन्य धर्म या जाति पर कुछ भी नहीं लिखा था।
उन्होंने सहसा उस व्यक्ति से पूछ लिया कि इन दोनों सम्राटों में से ज्ञानवान और सत्यनिष्ठ कौन है जिससे वह संवाद कर सकें?
वह व्यक्ति कुछ न कह सका, क्योंकि सम्राटों के ज्ञान और सत्यनिष्ठा के बारे में तो उसने कभी चिंतन ही नहीं किया था, हां उन दोनों की जाति और धर्म वह अवश्य जानता था क्योंकि उन दोनों ने समय समय पर अपनी जाति और धर्म की घोषणा स्वयं की थी। वह तो सदियों से जाति और धर्म के आधार पर ही अपने शासकों का जयकारा लगा रहा था।
इसी वार्तालाप के दौरान सामने सम्राट नीतिगुप्त का महल दिखाई देने लगा था। सम्राट चंद्रगुप्त सोच रहे थे कि गुरुदेव को समुचित स्थान दिला कर मैं भी विश्राम करने जाऊंगा। द्वार पर पहुंचने पर उन्हें सुरक्षा कर्मियों ने रोक लिया। उनकी जांच होने लगी। सम्राट चंद्रगुप्त के लाख कहने पर कि मैं सम्राट नीतिगुप्त का पूर्वज हूं, स्वर्ग से आया हूं और उसकी सहायता करना चाहता हूं, यह मेरे गुरु चाणक्य हैं, सुरक्षा अधिकारियों ने उनकी एक न सुनी और उन्हें संदेह के आधार पर कैद कर लिया गया। वहां उनकी कोई स्मृति थी ही नहीं, न कभी सम्राट नीतिगुप्त ने किसी मंच पर चाणक्य या चंद्रगुप्त की चर्चा ही की थी।
ज्ञान और सत्य के पराभव ने पाटलिपुत्र को आज ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया था जहां उसे उसके अपने इतिहास और विचारों की विरासत का भान नहीं था, फिर पूर्वजों का कैसे होता?
उनके पास कोई आधार कार्ड नहीं था, प्रपत्र के नाम पर बस स्वर्ग में रहने का प्रमाण पत्र था जिसे फर्जी मानकर उन्हें कारागार में डाल दिया गया, चाणक्य और चंद्रगुप्त की लिखी हुई पुस्तकें जो वह सम्राट नीतिगुप्त के लिए लाए थे उन्हें बेकार मानकर किसी कोने में डाल दिया गया। अब उनके स्वर्ग लौटने की सारे रास्ते बंद हो चुके थे। वह उसी थाने में कैद थे जहां से उन्होंने पाटलिपुत्र की यात्रा शुरू की थी। कुछ दिन और बीतने पर सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें बताया की चौबीस मैदानों वाले युद्ध के बाद पाटलिपुत्र और हस्तिनापुर के संबंध आत्मीय हो चले थे। नीतिगुप्त ने हस्तिनापुर के राजा विशेषगुप्त के साथ संधि कर ली थी और अमात्य चतुरसेन और अमात्य तेजवीर कि बैठकें अब एक साथ होने लगी थी। अब दोनों सम्राट विशेषगुप्त और नीतिगुप्त एक दूसरे के प्रशंसक बनकर प्रजा के सामने एक दूसरे से गले मिल रहे थे। चंद्रगुप्त को समझ में आने लगा था कि हस्तिनापुर और और पाटलिपुत्र दोनों में जाति और धर्म की चौसर बिछी हुई थी, जाति और धर्म का खेल खुलकर खेला जा रहा था। प्रजा इन दोनों सम्राटों के लिए एक मोहरे के अलावा कुछ नहीं थी जिसे पासे की भांति कभी जाति की चौसर पर तो कभी धर्म की चौसर पर खेल दिया जाता। तभी उन्होंने गुरुदेव को अपनी शिखा खोलते हुए देखा। वह हतप्रभ रह गए। शायद चाणक्य ने पाटलिपुत्र को विनाश से बचाने का प्रण कर लिया था। वह स्थान जहां से उन्होंने पाटलिपुत्र की यात्रा शुरू की थी वही आज फिर से उनका प्रस्थान बिंदु बन गया था। उनके चेहरे पर एक अजब सी कांति थी, वह गहन चिंतन में लीन थे और अपने उद्देश्य के आगे स्वर्ग को भूल चुके थे। उनकी भाव भंगिमा देखकर चंद्रगुप्त को अपने बूढ़े शरीर में नए रक्त का प्रवाह होता हुआ अनुभव होने लगा। उनको लगने लगा की मातृभूमि और गुरु की इच्छा पूर्ण करने के आगे उनकी और कोई इच्छा नहीं हो सकती। उनकी भुजाएं आज फिर फड़कने लगी थी जैसे समर भूमि में जाने से पूर्व अपनी सेना को संगठित करने का समय नजदीक आ रहा हो। समूचे पाटलिपुत्र में उन दोनों के संघर्षों का साक्षी यदि कोई था तो सिर्फ मां गंगा थीं जो आज भी सतत रूप से पाटलिपुत्र की भूमि को सिंचित कर रही थीं । चाणक्य ने अचानक चंद्रगुप्त को कारागार के द्वार को तोड़ने का इशारा किया और चंद्रगुप्त ने एक मुष्टिका के प्रहार से उसे तोड़ डाला। द्वार खोलकर दोनों गुरु शिष्य आगे की ओर बढ़ चले। सभी प्रहरी शराबबंदी के बावजूद नशे में थे और कुछ खाली बोतलें इधर-उधर लुढ़क रही थीं । वे दोनों गंगा तट की ओर बढ़े जहां चाणक्य को गंगा को साक्षी मानकर अपना संकल्प लेना था। मां गंगा की दुर्दशा देखकर वह आश्चर्यचकित थे। हस्तिनापुर और पाटलिपुत्र की शासन प्रणाली ने मां गंगा को इस दीन हीन अवस्था में पहुंचा दिया था । उन्होंने अपनी अंजुली में थोड़ा सा गंगाजल लिया और उसे आगे कर कुछ मंत्र पढ़ने लगे। उनके मंत्र पढ़ते ही चंद्रगुप्त को लगा की गंगा की लहरों में अचानक स्पंदन आ गया है। वे दोनों वहां से एक अज्ञात स्थान की ओर बढ़े जिसका पता सिर्फ चाणक्य को था। शायद वही उनकी अगली कर्मभूमि थी जहां उनको पाटलिपुत्र के अगले सिंह शावक की तलाश करनी थी।